ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 4
पाठ का परिचय (Introduction):
'नेताजी का चश्मा' स्वयं प्रकाश जी द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय और देशभक्ति से ओतप्रोत कहानी है। यह कहानी हमें बताती है कि देशभक्ति केवल सीमाओं पर लड़ने वाले सैनिकों का ही अधिकार नहीं है, बल्कि देश का हर छोटे-से-छोटा नागरिक, यहाँ तक कि बच्चे और अपाहिज लोग भी अपने-अपने तरीकों से देश-निर्माण और देशभक्ति में योगदान दे सकते हैं। कहानी एक चश्मे वाले ('कैप्टन') के इर्द-गिर्द घूमती है, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बिना चश्मे वाली मूर्ति पर रोज़ एक नया चश्मा लगाता है।
हालदार साहब हर पंद्रहवें दिन अपनी कंपनी के काम से एक छोटे से कस्बे से गुज़रते थे। उस कस्बे के चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की संगमरमर की एक मूर्ति लगी थी, जिसे कस्बे के ही इकलौते हाई स्कूल के ड्राइंग मास्टर (मोतीलाल) ने ग़लती से बिना चश्मे के बना दिया था।
हालदार साहब ने पहली बार जब मूर्ति को देखा, तो वे हैरान रह गए क्योंकि मूर्ति पत्थर की थी, जबकि उस पर चश्मा असली (रियल) फ्रेम वाला पहनाया गया था। जब वे अगली बार वहाँ से गुज़रे, तो चश्मा बदला हुआ था। उन्होंने पानवाले से इसका कारण पूछा।
पानवाले ने बताया कि यह मूंछों वाले एक बुज़ुर्ग और लंगड़े चश्मेवाले का काम है, जिसे लोग 'कैप्टन' कहते हैं। चूँकि कैप्टन नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति नहीं देख सकता, इसलिए वह अपनी ओर से एक चश्मा मूर्ति को पहना देता है। जब किसी ग्राहक को मूर्ति पर लगा चश्मा पसंद आ जाता है, तो कैप्टन वह चश्मा उतारकर ग्राहक को दे देता है और नेताजी को दूसरा चश्मा पहना देता है।
हालदार साहब कैप्टन की इस देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। उन्हें यह जानकर बहुत बुरा लगा कि लोग कैप्टन को 'पागल' कहते हैं। करीब दो साल तक यही सिलसिला चलता रहा।
एक दिन हालदार साहब ने देखा कि मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं है। पूछने पर पानवाले ने रोते हुए (नम आँखों से) बताया कि 'कैप्टन मर गया'। हालदार साहब बहुत दुखी हुए और उन्होंने तय किया कि अब वे कभी उस चौराहे पर नहीं रुकेंगे।
कुछ दिन बाद जब वे पुनः उस कस्बे से गुज़रे, तो उन्होंने मुड़कर मूर्ति की ओर न देखने का निश्चय किया था। लेकिन उनकी आदत से मजबूर आँखें चौराहे पर मूर्ति की ओर उठ गईं। वे चीख कर जीप रुकवाते हैं। उन्होंने जो देखा, उससे उनकी आँखें भर आईं—नेताजी की आँखों पर सरकंडे (bamboo reed) से बना हुआ एक छोटा-सा चश्मा रखा था, जैसा बच्चे बना लेते हैं।
हालदार साहब भावुक हो गए। उन्हें एहसास हुआ कि कैप्टन भले ही मर गया, लेकिन कस्बे के बच्चों के मन में देशभक्ति का बीज बो गया है। देश का भविष्य सुरक्षित है।
प्रसंग: हालदार साहब यह बात तब सोचते हैं जब पानवाला देशभक्त कैप्टन का यह कहकर मज़ाक उड़ाता है कि वह 'लंगड़ा' है और 'पागल' है।
व्याख्या: यह पंक्ति समाज के उस स्वार्थी वर्ग पर कड़ा प्रहार है जो देशभक्तों और शहीदों का सम्मान नहीं करता। हालदार साहब चिंतित होते हैं कि यदि समाज ऐसे लोगों का मज़ाक उड़ाएगा जो अपने देश के नायकों (सुभाष चंद्र बोस) को इज़्ज़त देते हैं, तो उस देश का भविष्य कैसा होगा? देशभक्तों का अपमान देश के पतन का कारण बन सकता है।
प्रसंग: कहानी का अंतिम भाग, जब कैप्टन की मृत्यु के बाद हालदार साहब मूर्ति को बिना चश्मे के देखने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उन्होंने देखा कि किसी बच्चे ने सरकंडे (घास/लकड़ी) का चश्मा पहना दिया था।
व्याख्या: यह कहानी का सबसे मार्मिक और आशावादी क्षण है। कैप्टन के मरने पर हालदार साहब को लगा था कि अब मूर्ति बिना चश्मे की रहेगी। लेकिन बच्चों के इस छोटे से प्रयास ('सरकंडे का चश्मा') ने यह साबित कर दिया कि देश की आने वाली पीढ़ी (बच्चों) के दिलों में भी देशभक्ति ज़िंदा है। इसी खुशी और भावुकता से उनकी आँखें भर आईं।
प्रश्न 1: सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?
उत्तर: चश्मेवाला कोई फौज में नहीं था और न ही वह नेताजी की आज़ाद हिन्द फ़ौज का सिपाही था। वह एक कमज़ोर, लंगड़ा और ग़रीब व्यक्ति था। फिर भी, लोग उसे व्यंग्य (मज़ाक) या सम्मान के रूप में 'कैप्टन' कहते थे क्योंकि उसमें देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वह नेताजी की मूर्ति को बिना चश्मे के नहीं देख सकता था, इसलिए वह हमेशा मूर्ति पर अपनी ओर से चश्मा लगा देता था। उसकी इसी देशभक्ति और नेताजी के प्रति सम्मान को देखकर लोग उसे 'कैप्टन' कहते थे।
प्रश्न 2: पानवाले का एक रेखाचित्र प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: पानवाला चौराहे पर पान की दुकान चलाता था। वह स्वभाव से बहुत मज़ाकिया, बातूनी और खुशमिज़ाज इंसान था। उसका शरीर मोटा था और हमेशा उसके मुँह में पान ठुँसा रहता था। पान खाने के कारण उसके दाँत 'लाल-काले' हो गए थे। जब वह हँसता था, तो उसकी तोंद थिरकने लगती थी। शुरुआत में वह देशभक्त 'कैप्टन' का मज़ाक उड़ाता है, लेकिन कैप्टन की मृत्यु की खबर देते समय उसकी आँखें नम हो जाती हैं, जिससे पता चलता है कि वह अंदर से एक संवेदनशील और भावुक इंसान भी था।
प्रश्न 3: कैप्टन की मृत्यु की बात सुनकर हालदार साहब क्यों दुखी हुए? बाद में उन्हें सरकंडे का चश्मा देखकर सांत्वना कैसे मिली?
उत्तर: हालदार साहब सच्चे देशभक्त थे। कैप्टन की मृत्यु की खबर सुनकर वे
दुखी इसलिए हुए क्योंकि उन्हें लगा कि कस्बे में अब कोई देशभक्त नहीं बचा है जो नेताजी का सम्मान करे और
उन्हें चश्मा पहनाए। उन्हें लगा मूर्ति अब हमेशा अधूरी रहेगी।
बाद में जब उन्होंने मूर्ति पर बच्चों द्वारा बनाया गया 'सरकंडे का चश्मा' देखा, तो उन्हें
सांत्वना और असीम खुशी मिली। उन्हें विश्वास हो गया कि कैप्टन की देशभक्ति व्यर्थ नहीं गई। कस्बे के बच्चों
के मन में नेताजी के प्रति सम्मान और देशभक्ति की भावना जाग्रत है, जिससे देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में
है।